बदहाल मजदूरों की गेंद अब न्याय पालिका के पाले में

Sushmit Sinha

कोरोना महामारी के चलते देश भर में पीछले तीन महिनों से लॉकडाउन है। सरकार का मानना है की इस लॉकडाउन से उसने कोरोना को देश भर में फैलने से रोका है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। देश भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या 1.50 लाख से उपर पहुंच गई है। ग्राफ पर ध्यान दें तो समझ आता है की अभी यह संख्या और बढ़ेगी। हालांकि भारत में कोरोना से होने वाली मौतें अन्य देशों के मुकाबले कम हैं। लेकिन लॉकडाउन से जो देश भर में परेशानी हुई है उसने सराकारी इंतज़ामों की कलई खोल दी है। करोड़ों लोग बेरोजगर हो गए। बड़े शहरों में मजदूरों के पास काम न होने के कारण भूखो मरने की नौबत आ गई। लॉकडाउन की वजह से सभी आवागमन के साधन बंद थे। जब पेट आग की आग से शरीर जलने लगा तो मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने पर मजबूर हो गए। हजारों किलोमीटर का सफर लाखों मजदूरों ने पैदल ही नापने का फैसला कर लिया।

 

  • श्रमिकों ने ऐसा क्यों किया ?

 

देश में लॉकडाउन अचानक लागू किया गया जिसकी वजह से जो जहां था वहीं रुक गया। न किसी को राशन जुटाने का मौका मिला न पैसे जोड़ने का सब जितने पे था उतने पे ही थम गया। कुछ वक्त गुज़रा तो राशन खत्म होने लगा और पैसे भी। कंपनियों ने पहले तो तनख्वाह देना बंद किया फिर कंपनी में काम न होने का कारण देते हुए कंपनी से ही निकाल दिया।बड़े शहरों में अधिकतर मजदूर किराये के कमरों में रहते हैं। उन्हें किराये के लिए परेशान किया जाने लगा। कितने मजदूरों के साथ तो मार-पीट भी हुई। हालांकि सरकारों ने मकान मालिकों से अपील की थी की लॉकडाउन में किरायदारों से किराया न मांगा जाए। पर इस देश में अपील कितनी सुनी जाती है यह हम और आप अच्छे से जानते हैं।

 

  • सरकारी तंत्र रहा फेल

 

केंद्र और राज्यों की सरकारें श्रमिकों को यह विश्वास दिलाने में फेल रहीं की सरकार उन्हें हर जरूरत का सामान मुहैया कराएगी। पर मजदूरों को सिर्फ कोरे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। जब मजदूर भूख और बेबसी से पस्त हो गए तब उन्होंने अपने गांव की ओर जाने का फैसला लिया। वो पैदल सड़कों पर चलते रहें पर उनकी सुध किसी ने नहीं ली सिर्फ एसी कमरों में बैठ कर आदेश दे दिया गया कि किसी मजदूर को सड़कों पर नहीं चलने दिया जाएगा। हांलाकि उसके बाद भी श्रमिक पैदल रेल पटरियों सड़कों के माध्यम से अपने गांव पहुंचते रहे। इनमें कई मजदूर दुर्घटनाओं का शिकार हुए और अपनी जान गवां दी। हमनें कितने वीडियोज़ देखें जिनमें छोटे-छोटे बच्चे दर्द से कराह रहे थे। उनके पैर छालों से भर गए थें कितने बच्चों ने तो भूख-प्यास से रास्ते में ही दम तोड़ दिया। बाद में सरकारों को होश आया तो श्रमिक ट्रेंने चलाईं गईं पर बदइंतज़ामी वहां भी, एक दिन का समय जहां पहुंचने में लगता है वहां ये ट्रेने यात्रियों के दो-दो ढाई-ढाई दिनों में पहुंचा रही हैं। यात्री ट्रेनों में भी परेशान है एक तो उनसे जादा किराया वसूला जा रहा है,ऊपर से इंतजाम के नाम पर कुछ नहीं।यहां तक की प्लेटफार्मों पर पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं। कितने मजदूरों ने ट्रेनों में ही भूख प्यास से तड़प कर दम तोड़ दिया। हालांकि  यहां कुछ गैर सरकारी संस्थाओं और लोगों का आभार प्रकट करना चाहिए जिन्होंने खुल कर जितना हो सके उतना मदद की।

 

  • न्याय पालिका पर सवाल

 

भारत जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में न्याय पालिका की अहम भूमिका हमेंशा से रही है। लोगों का मानना है कि जब सब फेल हो जाता है तब न्याय पालिका रास्ता बताती है। इस देश के करोड़ों लोगों का न्याय पालिका पर अडिग विश्वास है। पर पिछले कुछ सालों से इस संस्थान पर सवाल उठने लगे हैं। यह सवाल कोई और नहीं बल्कि वहीं के रिटायर जजों या वरिष्ठ अधिवक्तों ने उठाया है। कोविड-19 के दौरान मजदूरों कि स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर ने सुप्रिम कोर्ट की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि, ‘न्यायपालिका अपने संवैधानिक कर्तव्यों को सही तरह से नहीं निभा रहा है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय अच्छा काम करने में सक्षम है, लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है, उन्हें विचार-मंथन करके यह पता लगाने की आवश्यकता है कि वे आगे कैसे बढ़ें। निश्चित रूप से कोर्ट को और अधिक सक्रिय होना चाहिए।’ बता दें की अपने छह साल के लंबे कार्यकाल के बाद जस्टिस मदन लोकुर दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे। द वायर के वरियष्ठ पत्रकार करन थापर को दिए एक इंटरव्यु में उन्होंने कुछ सवालों के जवाब कुछ इस प्रकार दिए।

प्रवासी मजदूरों के जीवन के अधिकार से जुड़े एक मामले में फैसला लेने में कोर्ट द्वारा तीन हफ्ते का समय लगाने के सवाल पर जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘हां, मुझे लगता है कि कोर्ट ने इन प्रवासियों को निराश किया है।’ कोर्ट द्वारा ये कहना कि सरकार प्रवासी मजदूरों के लिए जो अच्छा समझे वैसा कदम उठाए, इस पर पूर्व जज ने कहा, ‘मुझे लगता है कि अदालत इससे ज्यादा कर सकती थी और उसे करना चाहिए था।’

करन थापर द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या वह भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के इस रुख से सहमत हैं- जहां उन्होंने 27 अप्रैल को द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि ‘यह ऐसी स्थिति नहीं है, जहां अन्य किसी समय की तरह अधिकारों को बहुत प्राथमिकता या महत्व दिया जाए, जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘यह कहना कि मौजूदा परिस्थिति की वजह से अभी के समय में मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, ये गलत तरीका है।’

उन्होंने कहा, ‘आप ये नहीं कह सकते कि अभी के समय में हमें जीवन के अधिकार को भूल जाना चाहिए। यदि आप आपातकाल के समय जीवन के अधिकार को नहीं भूल सकते हैं तो मुझे समझ नहीं आता कि अभी के समय में आप इसे कैसे भूल सकते हैं।’

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने अपने एक लेख में कहा था कि ‘अदालत ने सरकार के सामने अपनी न्यायिक शक्तियां सरेंडर कर दी हैं’, इस पर जस्टिस लोकुर ने सरेंडर शब्द को गलत बताया और कहा कि शीर्ष अदालत अपने संवैधानिक कामों को पूरी निपुणता से नहीं कर रही है।

अंत में उनसे पूछा गया कि क्या वह सर्वोच्च न्यायालय से निराश हैं, जस्टिस मदन लोकुर ने कहा, ‘हां, मैं निराश हूं। यह निराशाजनक है। निश्चित रूप से।’

 

  • मजदूरों की बदहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान

 

इतने आरोप प्रत्यारोपों के बीच सुप्रींम कोर्ट ने मंगलवार को प्रवासी मज़दूरों की बदहाली का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित क्षेत्रों को नोटिस जारी किया था जिसमें अदालत ने पूछा था कि उन्होंने प्रवासी मज़दूरों की इस स्थिति को ठीक करने के लिए क्या किया है?

गुरुवार को केंद्र सरकार समेत कई राज्य सरकारों ने अदालत में अपना पक्ष रखा, जिसपर क़रीब घंटा भर जिरह हुई और अंत में इस मामले पर अपना अंतरिम आदेश पढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने कहा,

किसी भी प्रवासी मज़दूर से ट्रेन या बस का किराया ना लिया जाये। रेलवे का किराया दो राज्य सरकारों के बीच शेयर किया जाए, प्रवासी मज़दूरों से नहीं।

जब भी राज्य सरकारें ट्रेनों की माँग करें, तो रेलवे उन्हें ट्रेनें उपलब्ध कराये।

ट्रेन यात्रा के दौरान, स्टेशन से ट्रेन के चलने पर राज्य सरकारें यात्रियों के खाने और पीने की व्यवस्था करें।

रेलवे मज़दूरों को यात्रा के दौरान खाना-पानी मुहैया कराये।

बसों में भी मज़दूरों को खाना और पानी दिया जाये।

राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करें कि पंजीकरण के बाद प्रवासी मज़दूरों को जल्द से जल्द बसें मुहैया करवाई जायें।

जो प्रवासी मज़दूर सड़कों पर पैदल सफ़र करते दिखें, स्थानीय प्रशासन उनके खाने-पीने की व्यवस्था करे और उन्हें शेल्टर होम में ले जाये।

सुप्रीम कोर्ट मानता है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कई प्रयास किये हैं, लेकिन लोगों तक इनका फ़ायदा पहुँचता दिख नहीं रहा क्योंकि कई जगह चूक हुई है।

प्रवासी मज़दूरों के पंजीकरण की प्रक्रिया में कई ख़ामियाँ दिखती हैं। उनके परिवहन और खाने-पीने की व्यवस्था में भी दिक्कते हैं। ऐसा भी हुआ है कि मज़दूरों ने पंजीकरण करवा लिया, फिर भी उन्हें अपने घर लौटने के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा।

यूपी, महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को हमने सुना पर कई राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का जवाब नहीं दे पाईं। उन्हें इसके लिए कुछ वक़्त दिया जाता है। केंद्र और राज्य सरकारें क्या-क्या प्रयास कर रही हैं, वो उन्हें दर्ज करें।

सरकारें सुप्रीम कोर्ट को बताएं कि उनका ट्रांसपोर्ट प्लान क्या है, रजिस्ट्रेशन कैसे किया जा रहा है और कितने प्रवासी मज़दूर अभी घर लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं, उनकी संख्या कितनी है। यह जानकारी देने के लिए सभी राज्य सरकारों को 5 जून तक का समय दिया जाता है।

पर सवाल उठता है कि, क्या इस देश की न्याय पालिका ने ये फैसले लेने में देर नहीं कर दी। अगर न्यायपालिका पहले ही हस्तक्षेप कर देती तो शायद कितनों की जाने बच जातीं और देश मे मजदूरों श्रमिकों के हालात कुछ और होते।

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