अलोकप्रिय हो चुके हैं नीतीश कुमार, बिहार में बीजेपी को तलाशनी होगी दूसरी राह!

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नई दिल्ली। एक समय प्रधानमंत्री पद के दावेदार नीतीश कुमार बिहार में बेहद अलोकप्रिय हो गयें हैं। सुशासन बाबू का सुशासन बिहार के हर जिले में पनाह मांग रहा है। लगातार अपराध और हत्या से बिहार की कानून व्यवस्था पर सवाल उठ रहें हैं। पटना में बाढ़ की विभीषिका हो या अन्य जगहों पर बिहार सरकार हर जगह नाकाम रही है। जब पटना डूब रहा था तब कुछ केन्द्रीय मंत्रियों ने दबीजुबान नीतीश सरकार को कटघरे में खडा भी किया था, यहाँ तक कि केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इशारों हीं इशारों में अपनी बेबसी की बात जाहिर कर दी थी। केन्द्रीय नेतृत्व के मना करने के बावजूद गाहेबगाहे विरोध के स्वर सुनाई दे हीं देते हैं। केन्द्रीय मंत्री अश्वनी चौबे और गिरीराज सिंह तो हमेशा नीतीश कुमार के सुशासन पर टिप्पणियां करते रहते हैं। अभी हाल में बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता संजय पासवान ने भाजपा को नीतीश कुमार से अलग रहकर विधानसभा चुनाव लड़ने की सलाह दी है। आपको बता दें ये सुझाव केवल संजय पासवान का नहीं है,बिहार के अधिकांश विधायक और सांसद चाहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी अब बिहार में अकेले चुनाव लड़े, कारण वो नीतीश कुमार के खिलाफ बन रहे माहौल में भागीदार नहीं बनना चाहते हैं।


केन्द्रीय नेतृत्व भी इस बात को समझ रहा है इस वजह से उन्होंने झारखंड में अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था, यद्यपि उसमें वे बुरी तरह असफल रहे. मगर मंशा ये थी कि अगर वे इस प्रयोग में सफल हो जाते हैं तो इस माँडल को बिहार में भी आजमाया जाएगा। झारखंड चुनाव में बुरी तरह पराजय के बहुत से कारण थे,पहला महत्वपूर्ण कारण मुख्यमंत्री रघुवर दास के खिलाफ भारी असंतोष था। झारखंड के मूलनिवासी आदिवासी मुख्यमंत्री चाहते थे मगर केन्द्रीय नेतृत्व ने बेहद घमंडी और बदजुबान रघुवर दास को मुख्यमंत्री चुना जो केन्द्रीय योजनाओं को राज्य में लागू करने में बुरी तरह विफल रहे थे। दूसरा जो महत्वपूर्ण कारण रहा वो विकास कार्यो को करने में रघुवर दास सरकार पूर्णतया असफल रही थी।

झारखंड में करारी हार की दुर्गति झेलने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व सकते में हैं, वो शायद ये प्रयोग बिहार में न करे मगर भाजपा को ये समझना होगा कि बिहार के लोग नीतीश कुमार के तथाकथित सुशासन से ऊब चुके हैं और वे बदलाव चाहते हैं।जमीनी हकीकत तो ये है कि अगर भाजपा गठबंधन में चुनाव लड़ी तो उसे बहुत से परपंरागत सीटों पर हार का सामना करना पड़ सकता है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को जनता के मूड को समझना होगा जो आज नीतीश कुमार की पार्टी के बिल्कुल खिलाफ है।


एनआरसी और सीएए पर एक कदम आगे तो दो कदम पीछे चलने की रणनीति को बिहार के मुसलमान अच्छी तरह समझ गए हैं, वे इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के साथ जा रहें हैं ये तो तय मानिए। भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चलाने के बावजूद जेडीयू को बडी संख्या में मुसलमान वोट करते थे, कारण उनकी छवि अच्छे प्रशासक और सभी को साथ लेकर चलने की थी मगर अब मुसलमानों का भी नीतीश से मोहभंग हो गया है। नीतीश कुमार भी भारी उहापोह में हैं वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो किधर जाएं। एक तरफ लगातार दरकती जमीन है दूसरी तरफ हिंदू कार्ड्स खेलकर वैतरणी पार करने की लालसा। दो बार पलटते हुए आखिर नीतीश ने ये घोषणा कर दी है कि बिहार में एनआरसी और सीएए लागू नहीं होगा मगर सुशासन बाबू इतने समय में आपका तथाकथित सेक्यूलर चेहरा बेनकाब हो गया है। मुसलमानों ने आपके छिपे एजेंडा को समझ लिया है।

नीतीश कुमार बिहार में एनआरसी और सीएए न लागू करने की बात करके एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं। एक तरफ उनकी निगाह मुस्लिम वोटबैंक पर है तो दूसरी तरफ भाजपा पर दवाब बनाकर सीटों पर सौदेबाजी करना चाहते हैं।भाजपा के अंदर मांग उठ रही है कि इस बार बडे भाई की भूमिका उन्हें मिले और ये जायज भी है। हर पार्टी को अपना विस्तार करना हीं चाहिए और इसके लिए अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना बेहद जरूरी है।

नीतीश कुमार के खिलाफ लोगों का आक्रोश इस बात से भी समझा जा सकता है कि उनकी जनसभाओं में भीड़ नदारद रहती है,बेहद शांत रहने वाले नीतीश बाबू अक्सर अपना आपा खो दे रहे हैं। उनके शासन के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया बेहद निराशाजनक है। बिहार के निवासी बिगड़ती कानून व्यवस्था,राज्य की नौकरशाही और पुलिस के बारे में मुखर होकर बोल रहें हैं। लोगों का कहना है कि नीतीश कुमार की ताकत लालू यादव का डर था। यह धीरे धीरे काफी कम हो गया है। अब जनता जागरूक हो गई है और वो विकास के मुद्दे पर बात करना चाहती है, अब उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि अतीत में लालू यादव ने क्या किया था। जंगलराज वाला जुमला अब परवान नहीं चढ़ने वाला ये नीतीश कुमार भी अच्छी तरह समझ रहें हैं तभी वो एक साथ दो नावों में सवारी करने की दुविधा में हैं। नीतीश कुमार ने जो शराबबंदी लागू की थी उसका बिहार में खूलेआम माखौल बनाया जा रहा है। उ.प्र से तस्करी के द्वारा रोज शराब की भारी खेप बिहार पहुंच रही है। सीमावर्ती थानों के पुलिस और अधिकारी चाँदी काट रहे हैं।माफिया-पुलिस-नेताओं का सिंडिकेट चल रहा है वो भी सरकार की नाक के नीचे। फ्रूटी के पैकेट में शराब भरकर सरेआम बिक्री की जा रही है सरकार पंगु बनकर चुपचाप बैठी है।

नीतीश कुमार ने सड़क और बिजली के क्षेत्र में अच्छा काम किया है इसमें किसी को भी शंका नहीं है। अर्थव्यवस्था में भी सुधार है।2017-18 में विकास दर 11.3% था जो देश में सबसे बेहतर है। पिछले वर्ष यह 9.9% थी।2017-18 में राजस्व का अधिशेष बढ़कर 14,823 करोड़ रू हो गया, जो 2013-14 में 6,441 करोड़ रूपये था। इसमें कोई शंका नहीं है कि बिहार की अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इस वृद्धि का सामाजिक प्रभाव संतोषजनक नहीं है क्योंकि यह विकास शहर केंद्रित है।
लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने अपनी शर्तों पर सीटों का बंटवारा किया था और भाजपा को पाँच और सीट देने को मजबूर किया था जिसे भाजपा ने 2014 में जीता था।लोकसभा में नीतीश के हठ के कारण हीं दोनों को बराबर के सीट पर लड़ने को मजबूर किया था। अब भाजपा में सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को बडे भाई की भूमिका मिलनी चाहिए जो पार्टी के विस्तार के लिए जरूरी भी है।

बिहार में इन दिनों स्लोगन पाँलटिक्स चल रही है,एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तरह तरह के स्लोगन चलाए जा रहें हैं।कुछ समय से भाजपा के कुछ नेता और राष्ट्रीय जनतादल यूनाइटेड के नेताओं ने नीतीश कुमार को बदलने की मांग की है।उसके जवाब में सत्ताधारी पार्टी जेडीयू ने मुख्यालय पर बैनर लगाकर एक नया नारा दिया है “क्यों करें विचार, ठीके तो हैं नीतीश कुमार।” इसके जवाब में विपक्षी पार्टी राजद के मुख्यालय के सामने कार्यकर्ताओं ने एक। बैनर लगाकर जवाब दिया है,”क्यों न करें विचार ,बिहार जो है बीमार।”

राष्ट्रीय जनता दल ने इस बार ज्यादा सीटों पर लड़ने का मन बना लिया है। पार्टी लोकसभा चुनाव के परिणाम को देखकर इस बार ज्यादा सतर्क है और वे चाहते हैं कि पार्टी के विस्तार के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटों पर मजबूती से लडा जाय। राजद के सूत्रों ने कहा है कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले की गई गलती को सुधारने के लिए तैयार है।राजद ने अपने सभी सहयोगी दलों कांग्रेस, आरएलएसपी, एचएएम, सीपीआई(एमएल) और विकासशील इंसान पार्टी से अधिक सीटें जीतीं थीं,जिसके वे हकदार थे। राजद ने ये तय कर लिया है कि वो 2020 के विधानसभा चुनाव में 243 सीटों में कम से कम 150 सीटों पर लड़ेगी।

झारखंड विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद भाजपा बैकफुट पर है। अब उसे हीं फैसला करना होगा कि वह अलोकप्रिय हो चुके मुख्यमंत्री को ढोएगी या अपना सफर अकेले तय करेगी।

अजय श्रीवास्तव, संपादक- परिधि समाचार.

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