सिनेमा पर विशेष: दिलीप को साधने डायरेक्टर बने मनोज कुमार

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वीर विनोद छाबड़ा। दिलीप कुमार को डायरेक्ट करने के लिए एक्टर-डायरेक्टर-प्रोड्यूसर-लेखक और दादा साहब फाल्के अवार्डी पद्मश्री मनोज कुमार को हर ख़ास-ओ-आम जानता है। देशभक्ति से ओतप्रोत फ़िल्में बनाने में उनका कोई जवाब नहीं रहा। लेकिन उनके बारे में एक ख़ास बात लोग नहीं जानते हैं। वो डायरेक्टर क्यों बने? इसके पीछे एक कहानी है। वो दिलीप कुमार के ज़बरदस्त फैन थे। उनकी कोई भी फिल्म नहीं छोड़ते थे। तब वो मनोज कुमार नहीं हरिकृष्ण गोस्वामी हुआ करते थे। उन दिनों वो महज़ बारह साल के थे जब उन्होंने दिलीप कुमार-कामिनी कौशल की ‘शबनम’ (1949) देखी थी। वो दिलीप कुमार के किरदार मनोज से इतना ज़्यादा प्रभावित हुए कि खुद को मनोज कहलवाने लगे। जब फिल्मों में आये तो अपना स्क्रीन नाम मनोज कुमार रखा।

मनोज की दो दिली इच्छाएं थीं, दिलीप कुमार के साथ काम करना और उन्हें साधना यानी डायरेक्ट करना। उनकी पहली इच्छा तो दक्षिण भारत के प्रसिद्ध प्रोड्यूसर पीएस वीरप्पा ने पूरी कर दी ‘आदमी’ (1968) में, जो एक प्रेम-त्रिकोण पर आधारित थी। उन्होंने डॉक्टर की भूमिका की थी और अपने प्रेम की कुर्बानी दी थी। उन्हें बेहतरीन एक्टिंग के लिए उन्हें फिल्मफेयर ने बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर लिए नॉमिनेट भी किया था। कमाई के हिसाब से औसत दर्जे की इस फिल्म के निर्माण के दौरान एक हादसा हुआ। डायरेक्टर ए.भीमसिंह को फालिज़ ने घेर लिया। फिल्म की रफ़्तार कम हो गयी, बल्कि ठप्प हो गयी। प्रोडयूसर वीरप्पा चिंतित हुए। डायरेक्टर भीमसिंह ने उन्हें सलाह दी बाकी फिल्म को मनोज कुमार से डायरेक्ट करा लें। वो क़ामयाब फिल्म ‘उपकार’ डायरेक्ट कर ही चुके हैं। इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड भी मिल चुका है। इस ख़बर से मनोज भी बहुत खुश हुए, उन्हें अपने महबूब स्टार दिलीप कुमार को डायरेक्ट करने की दिली इच्छा पूरी करने का मौका मिल रहा है। मगर सवाल उठा कि दिलीप कुमार जैसे सीनियर एक्टर को मनोज जैसे जूनियर अगर डायरेक्ट करेंगे तो दिलीप कुमार की साख़ को धक्का लगेगा। तब निर्णय हुआ कि फिल्म के वो हिस्से जिसमें दिलीप कुमार नहीं हैं उन्हें मनोज कुमार डायरेक्ट करेंगे और जब भीमसिंह ठीक हो जाएंगे तो वो दिलीप कुमार वाले हिस्से डायरेक्ट कर लेंगे।

और यही हुआ भी। मगर मनोज कुमार के दिल को बड़ी ठेस लगी। उन्होंने तय किया वो दिलीप कुमार को आज नहीं तो कल साध कर ही दम लेंगे। ये मौका आया 1857 के ग़दर पर आधारित ‘क्रांति’ (1981) में। ये वो दौर था जब मनोज कुमार तब तक एस्टैब्लिशड सीनियर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर बन चुके थे। दिलीप कुमार को भी मनोज के डायरेक्शन में काम करने से कोई परेशानी नहीं थी। परेशानी होने का कोई सबब भी नहीं था क्योंकि दिलीप कुमार हीरो से बतौर करेक्टर हीरो तब्दील हो रहे थे और मनोज ने उन्हें जो कहानी सुनाई थी उसमें उनका देशभक्त का दमदार रोल भी था।

और इस तरह मनोज की दिली इच्छा पूर्ण हुई। हालांकि ‘क्रांति’ जिस ऊँची उम्मीदों के साथ बनी थी वो पूर्ण नहीं हुई, क्योंकि सलीम-जावेद लिखित स्क्रिप्ट बहुत कमज़ोर थी मगर एक्टिंग और म्यूज़िक की दृष्टि से उच्च कोटि की रही। और इसी कारण इसे देखने लोग सिनेमा हाल में उमड़े। कमाई के लिहाज़ से ये उस साल की सबसे क़ामयाब फिल्म थी। अब ये अलग त्रासदी है कि इसके बाद मनोज कुमार निर्मित कोई भी फिल्म क़ामयाब नहीं हुई।

 

Vir vinod chhabraवीर विनोद छाबड़ा: लेखक लंबे समय से सम सामयिक मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। करीब 4 दशकों के लेखन में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। सिनेमा, खेल, अध्यात्म की दुनिया पर खास पकड़ है।

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