श्रद्धा की कलम से: कोरोना ने सबकुछ बदल दिया है, बहुत कुछ सिखा दिया

Anchal Shukla

ये वही मजदूर हैं जो आपके लिए बड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े करते है। खुद को मौत की सूली पर लटका कर, क्योंकि साहब इनको अंग्रेज़ी नहीं आती। इन्होंने सिर्फ पेट में लगने वाली भूख की भाषा याद की है।

श्रद्धा दुबे। साल 2020 यकीनन दुनिया के लिए सबसे बुरे सालों में शामिल हो गया है। इस साल इतना कुछ हो गया जो वैश्विक स्तर पर काफी आहत करने वाला है। इस बारे में सोचने भर से लोगों की रूह कांप जाती है। कोरोना महामारी पर किसी का वश नहीं चल रहा है। विश्व शक्ति अमेरिका से लेकर चीन, भारत या अन्य कोई भी देश हो, इस बीमारी ने सबको घुटनों पर ला दिया। हम सबको अब धीरे धीरे यकीन सा होने लगा है कि ये बीमारी अब कहीं नहीं जाएगी। यहीं रहेगी हमारे बीच, जैसे और विषाणु जनित बीमारियां हम सब के बीच हैं।

 

कोरोना जाए या नही ये अलग बात है, लेकिन इस बीमारी ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। कहां इंसान अपनी बौद्धिक शक्ति का फायदा उठा कर प्रकृति को अपने वश में करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब कोरोना के दम पर प्रकृति ने हमें अपनी हद की याद फिर से दिला दी है। कोरोना की वजह से अब हमारे जीवन जीने के सलीके में काफी बदलाव भी आएंगे। शायद लोग आउटिंग के नाम पर बाहर घूमने जाना कम कर देंगे। मतलब भर का बाहर जाना और लोगों से भी एक पर्याप्त दूरी बना कर चलेंगे। इस बीमारी से सबसे बड़ी सीख ये मिली कैसे हम कम संसाधन के साथ जिंदगी जी सकते हैं। बेहद जरूरी काम भी हम घर बैठे कर सकते है। घर में रहने के चलते लड़कों ने किचन में हाथ आज़माना सीख लिया और किसी ने अपना छिपा हुआ टैलेंट खोज लिया है।

ये पूरी दुनिया में हो रहा है। ये बीमारी भी पूरी दुनिया में है, तो इससे होने वाली त्रासदी भी पूरी दुनिया झेल रही है। आर्थिक तौर पर हर देश कमजोर हो रहा है। हर देश कोशिश में लगा है इससे जूझने की। सभी देशों ने अपने अपने स्तर पर प्रयोगशाला में अपने वैज्ञनिकों और डॉक्टर्स को लगा रखा है वैक्सीन खोजने के लिए।

ये दुख वैश्विक दुख है, सबका है।

 

कुछ दुख हमारे बेहद अपने होते है। मजदूरों के मरने का दुख, जिनके आगे हमें दुनिया का दुख मतलब…कोरोना से जूझने का दुख कम लग रहा है।

 

ये वही मजदूर हैं जो आपके लिए बड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े करते है। खुद को मौत की सूली पर लटका कर, क्योंकि साहब इनको अंग्रेज़ी नहीं आती। इन्होंने सिर्फ पेट में लगने वाली भूख की भाषा याद की है। इनको तो हैंड सेनिटाइज करने का मतलब भी नहीं पता। ये सारा दिन आपकी फैक्ट्री की धूल और गन्ध फांकते है ताकि शाम होने तक आप उनकी दिहाड़ी दे दे और वो घर जाकर अपने अपनों का पेट पाल सकें। ये अपने घर जा रहे है। आपसे नहीं, खुद से निराश हो कर कि मैंने इन लोगों के लिए अपना घर छोड़ा था। उनको आपके 20 लाख करोड़ से क्या ही मतलब होगा जो अपने घर तक मरते मरते जा रहे है । साहब आपके 20 लाख करोड़ वाले उनको इतनी दिहाड़ी नहीं देते कि वो सेतु एप्प वाला फोन ले सके लेकिन इनके पास इतनी ताकत जरूर होती है कि ये आपको लाख करोड़ से अरब तक पहुंचा देते है अपने हाथों की मेहनत के दम पर। इनका मरना आप देख कैसे रहे है? कैसे आप चुप है? आपको इनकी मेहनत बिल्कुल भी याद नही आती? आपको इनके आंसू नहीं दिखते? ये मीलों की दूरी पैदल ही क्यों तय कर रहे है? आपको उनकी मजबूरी समझ नहीं आती? या आपको उनका पैदल चलना अपनी काली गाड़ी में बैठने जैसा लगता है?

 

कोरोना पर कंट्रोल नहीं हो रहा है, मानते है। लेकिन ये मौतें तो रोक लीजिए। यकीन मानिए दोबारा इलेक्शन होना है। उस समय की ही सोच कर कुछ मदद कर दीजिए और ये भी यकीन करिए कि आप ये अपना 20 लाख करोड़ इनके बिना कभी नहीं बढ़ा पाएंगे।

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