दिल्ली विधानसभा चुनाव: इस बार मोदी-शाह के सामने अलग तरीके से खड़े हैं अरविन्द केजरीवाल

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श्रवण शुक्ला। दिल्ली विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अगले एक महीने में इस बात का पता चल जाएगा कि दिल्ली की बाजी किस पार्टी ने मारी। हालांकि दावा आम आदमी पार्टी का लगातार तीसरी बार जीत का है और इस बात को आम लोग भी नहीं नकार रहे। लेकिन बीजेपी का कहना कुछ और है। बीजेपी का कहना है कि वो करीब दो दशक से ज्यादा समय बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी करने जा रही है। दिल्ली की सत्ता से मतलब यहां दिल्ली विधानसभा से है।

दिल्ली फतह करने के लिए सभी पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कई खिलाड़ी मैदान में हैं। कईयों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिलोरे मार रही है, तो कई छोटी या दूसरे राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां भी वोट कटवा की भूमिका में हैं। लेकिन मुख्य मुकाबला बीजेपी-कांग्रेस-आम आदमी पार्टी में है। इसमें भी मुख्य लड़ाई बीजेपी और आम आदमी पार्टी में है। कांग्रेस पिछले चुनाव की तरह ही इस बार भी हासिये पर दिख रही है।हालांकि वो बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों को ही नुकसान पंहुचाने में सक्षम है, इससे कोई इन्कार भी नहीं कर सकता। क्योंकि जिस सीट पर कांग्रेस के मजबूत प्रत्याशी होंगे, वहां मुकाबला कांटे का हो जाएगा और डर बाकी दोनों पक्षों में बढ़ेगा। लेकिन समग्रता में देखें तो कांग्रेस अभी मुख्य मुकाबले से बाहर है और उसे 8-14 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं। ये वो वोटर हैं, जो घूम फिर कर कांग्रेस का ही हाथ मजबूत करते हैं।

इस चुनाव में बीजेपी वर्सेज आम आदमी पार्टी

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने करिश्माई प्रदर्शन किया था। उस चुनाव में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने क्लीन स्वीप करते हुए 67 सीटें जीत ली थी, तो बीजेपी को सिर्फ तीन सीटों पर सिमट जाना पड़ा था। वहीं, कांग्रेस का तो खाता तक नहीं खुल पाया था। ये हाल तब था, जब अरविंद केजरीवाल को गंभीर नेता के तौर पर कोई नहीं देखता था। लोग जानते थे कि केजरीवाल सिर्फ राजनीति को बदलने आए हैं, लेकिन इन पांच सालों में केजरीवाल को लोगों ने बदलते देखा है और राजनीतिक तौर पर परिपक्व होते भी।

 

इस बार अरविंद केजरीवाल बीजेपी के लिए अलग तरह की सिरदर्दी के तौर पर सामने खड़े हैं। ये वही अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने 2014 के चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद 2015 में क्लीन स्वीप किया और अब 2019 की हार के बाद 2015 को 2020 में दोहराने को खड़े हैं।

 

अरविंद केजरीवाल इस बार इसलिए भी नरेंद्र मोदी-अमित शाह के सामने बेहद मजबूत दिख रहे हैं, क्योंकि ये चुनाव दिल्ली विधानसभा के चुनाव हैं। केंद्र के आम चुनाव में आम लोगों ने भी नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च नेता के तौर पर मान्यता दे दी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में मतदाता उन्हें अब नकार रहे हैं। और फिर जो स्थान केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का है, वही स्थान अब केजरीवाल बना चुके हैं।

इसे इस बात से समझिए कि लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा होने वाला कोई चेहरा नहीं था। और अब 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के सामने खड़ा होता कोई चेहरा नहीं दिख रहा है। ऐसा इसलिए भी है कि दिल्ली की जनता भी ये मान चुकी है कि दिल्ली में केजरीवाल ही सही है।

 

अरविंद केजरीवाल ही क्यों?

 

अरविंद केजरीवाल नहीं, तो कौन? सवाल ये आपसे भी है। बीजेपी से भी है। कांग्रेस से भी है। दिल्ली बीजेपी के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जो राजनीतिक तौर पर अरविंद केजरीवाल का विकल्प बन सके। डॉ हर्षवर्धन का करिश्मा ढल चुका है। मनोज तिवारी कभी उस तरह की गंभीरता दिखा नहीं पाए। विजय गोयल गुटबाजी में फंसकर रह गए। कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस पहले पार्टी छोड़कर जाते अपने नेताओं को रोके, मुख्यमंत्री पद का चेहरा तो बहुत दूर की बात है।

ePatrakaar.com के एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली में 70 फीसदी लोग अरविंद केजरीवाल को ही दिल्ली का चेहरा बने रहना देखना चाहते हैं। वहीं, मनोज तिवारी से ज्यादा लोग डॉ हर्षवर्धन को सीएम पद पर देखना चाहते हैं। वहीं, कुल वोटिंग की बात करें तो इस चुनाव में कांग्रेस को 8-14 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं। बीजेपी को 22-32 फीसदी वोट। वहीं, आम आदमी पार्टी 50% से अधिक वोट पाती दिख रही है। ये मत प्रतिशत चुनाव पर नजर रख रहे विशेषज्ञों की आंखें खोलने के लिए काफी हैं। जो अप्रत्याशित होने की वजह से चौंकाने वाले हैं।

 

श्रवण शुक्ला। लेखक पत्रकार हैं और ePatrakaar.com के फाउंडर एडिटर भी। पत्रकारिता के क्षेत्र में दशक भर से सक्रिय हैं। देश के शीर्ष संस्थानों में अनुभव लेने के बाद अब डिजिटल पत्रकारिता को बढ़ावा देने के प्रयास में लगे हुए हैं।

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