ePatrakaar Exclusive: सीरिया में कुर्दों के चंगुल से भागे ISIS के सैकड़ों लड़ाके, अमेरिका-तुर्की ने की मदद

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नई दिल्ली/रक्का। इस्लामिक स्टेट के खौफनाक शासन के अंत से संभल रही दुनिया के लिए बुरी खबर है। जी हां, ई-पत्रकार डॉट कॉम को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक सीरिया में कुर्दों की जेलों में कैद रहे सैकड़ों आईएसआईएस लड़ाके फरार हो गए हैं, वो भी तुर्की की मदद से। आईएसआईएस लड़ाकों के भाग निकलने के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वो फैसला भी है, जिसमें उन्होंने कुर्दों को मरने के लिए अकेला छोड़ दिया है और अमेरिकी सैनिकों को सीरिया से वापस बुला लिया है।

ई-पत्रकार को मिली जानकारी के मुताबिक सीरियाई गृहयुद्ध के साथ ही आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई से अमेरिका के कदम पीछे खींचने की वजह से ऐसा हुआ। क्योंकि अमेरिका के अपने सैनिकों के वापस बुलाने के साथ ही सीरिया के पड़ोसी देश तुर्की ने सीरियाई सीमा पर हमला बोल दिया है और 30 किमी चौड़े, करीब 500 किमी लंबे सीमाई क्षेत्र को एक गलियारे में बदलने की कोशिश में जुट गया है। तुर्की की कोशिश है कि ये पूरी जमीन सीरिया की हो, लेकिन उसे बफर जोन की तरह बनाया जाए, जिनमें तुर्की में रह रहे सीरियाई शरणार्थियों को बसाया जा सके। इसके लिए तुर्की सीरिया की सीमा में ऑपरेशन चला रहा है और इसी बहाने कुर्दों का खात्मा कर रहा है।

दरअसल, कुर्दों की चंगुल से भागे करीब 800 आईएसआईएस लड़ाकों के साथ ही उनके परिवार वाले भी भाग गए हैं, जिनकी संख्या हजारों में है। इन आतंकियों को कुर्दों ने आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई के दौरान पकड़ा था, जिसमें अमेरिका उनकी मदद कर रहा था। लेकिन अब इस लड़ाई से अमेरिका पीछे हट गया है और तुर्की ने कुर्दों पर हमला बोल दिया है। इसी हमले के दौरान उस सेफ जोन के इलाके में तुर्की के सैनिकों ने एक जेल के पास हमला बोला, और इसी लड़ाई का फायदा उठाकर आईएसआईएस के आतंकी अपने परिवार के साथ फरार हो गए।

कौन हैं कुर्द?

मिडिल ईस्ट में कुर्द चौथे सबसे बड़े जातीय समूह हैं। कुर्द प्रथम विश्वयुद्ध के बाद से ही अपने लिए एक अलग देश की लड़ाई को लेकर युद्ध लड़ रहे हैं। कुर्दों के इलाके मौजूदा समय में चार देशों-सीरिया, तुर्की, इराक और ईरान में हैं, जहां कुर्दों के अलग अलग समूह सशस्त्र संघर्ष छेड़े हुए हैं। इनमें से कुर्दों तो इराक में काफी स्वायत्तता भी मिली हुई है। जबकि सीरिया और तुर्की में ये सरकार के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर उभरे हैं। हालांकि सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान कुर्दों के सबसे बड़े सैन्य समूह सीरियाई डेमोक्रेटिक फ्रंट(एसडीएफ) ने अमेरिका की मदद की और सीरियाई जमीन से आईएसआईएस के काले साम्राज्य को उखाड़ फेंका। इस समय सीरिया के अंदर काफी जमीन इनके कब्जे हैं और तुर्की को डर है कि कहीं उसकी जमीन को भी मुक्त कराने के लिए कुर्दों का संघर्ष न शुरु हो जाए। इसीलिए वो कुछ भी कर के कुर्दों की कमर तोड़ना चाहता है।

अमेरिका का पक्ष

अमेरिका की भूमिका वैश्विक परिदृश्य में देखें तो वो अब बेहद संदिग्ध हो चुकी हैं। इराक में बुरी तरह से फंसने के बाद अफगानिस्तान में उसने जो रणनीति अपनाई, कुछ उसी तर्ज पर सीरिया में भी उसने अलग रणनीति अपनाई। इसी रणनीति के तहत आईएसआईएस के खिलाफ उसने कुर्दों को धन, हथियार और ट्रेनिंग की मदद दी। और काम खर्चा होते ही वो कुर्दों को मरने के लिए छोड़ गया। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि अगर तुर्की कुर्दों पर हमला करेगा, तो वो तुर्की की अर्थव्यवस्था बर्बाद कर देंगे। लेकिन उनकी इस धमकी का तुर्की पर कोई असर नहीं पड़ा और उसने सीरिया में कुर्दों पर हमला बोल दिया।

सीरिया का पक्ष

पिछले काफी समय से सीरिया सुलग रहा है। यहां पूरी दुनिया की अलग अलग शक्तियां जोर आजमाईश कर रही हैं। सीरिया की तरफ रूस, ईरान जैसे देश हैं, तो सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ रहे गुट की तरफ तुर्की, सउदी अरब जैसे सुन्नी मुस्लिम देश हैं। वहीं, इस बीच सीरिया के बड़े हिस्से पर अधिकार करने के बाद आईएसआईएस भी एक पक्ष बना गया, जिसके खिलाफ अमेरिका युद्ध में कूद गया। हालांकि उसने सीमित तौर पर हवाई हमले किए, लेकिन आईएसआईएस से लड़ने में एसडीएफ ने अमेरिका का साथ दिया। हालांकि तुर्की के हमले के बाद सीरिया की सेना ने बॉर्डर इलाके की तरफ कूच किया है।

अब कुर्दों का क्या होगा?

होगा वही, जो मंजूर ए खुदा होगा। जी हां, कुर्दों को उम्मीद थी कि अमेरिका का साथ देने के बाद पश्चिमी देश उनकी आजादी की लड़ाई में साथ देंगे और अरबों के बीच अपनी अलग पहचान लिए वो कुर्दिस्तान को बनाने में सफल होंगे। लेकिन अब उनपर तुर्की के हमले के बादजूद पश्चिमी देशों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न देना बेहद चिंता का सबब बनता जा रहा है।

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