जेएनयू, असहिष्णुता, टुकड़े टुकड़े, दीपिका पादुकोण, छपाक और बॉक्स ऑफिस

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श्रवण शुक्ला। दीपिका पादुकोण का जेएनयू में होना फेसबुक, ट्विटर के खलिहर लोगों को खल गया। क्यों खल गया? क्योंकि वो जेएनयू चली गई थी। इसमें गलत क्या है? क्या अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ आपके पास है? दुनिया के बड़े बड़े सितारे विरोध प्रदर्शन में शामिल होते रहे हैं। अमेरिका के कई बड़े कलाकार पर्यावरण को लेकर जागरूकता फैला रहे हैं। रंगभेद के विरोध में नारेबाजी कर रहे हैं। मीटू के समर्थन में इंटरव्यू दे रहे हैं। यहां दीपिका जेएनयू गईं, और आपने बायकाट कर दिया। क्यों भाई?

एक फिल्म बनाने के पीछे लगी मेहनत को जानते हैं आप? न्यूज इंडस्ट्री के किसी भी प्रोड्यूसर से पूछो कि अगर उनका डेढ़ मिनट का पैकेज नहीं चल पाता, तो कितना बवाल काटते हैं वो। क्योंकि उसके पीछे मेहनत लगी होती है। एक रिपोर्टर की, असाइंमेंट टीम की, प्रोड्यूसर की, प्रोडक्शन एग्जीक्यूटिव की, वीडियो एडिटर की, एंकर के वॉयस ओवर की मेहनत और बुलेटिन तैयार करने वाले पैनल प्रोड्यूसर की मेहनत। सिर्फ डेढ़ मिनट के पैकेज के लिए प्रोड्यूसर कोहराम मचा देता है, जबकि दिन में वो 10 पैकेज बनाता है। फिर आपने कैसे छपाक का बायकाट कर दिया?

 

इस बार को समझिए कि फिल्म प्रोडक्शन कोई खेल नहीं है। मैं आजतक अपना स्क्रिप्ट को उस लायक नहीं बना पाया कि एक फीचर फिल्म बना पाऊं। ऊपर से दीपिका ने लक्ष्मी की कहानी को हम सबके सामने रखा। अपना पैसा लगाया। महीनों की मेहनत लगाई। और आप बायकाट कर देंगे?

 

किसी के रोजगार को बर्बाद करके आप उसपर चुप रहने का दबाव डालेंगे? क्या ये इनटोलरेंस नहीं है? छपाक ने अपनी सीमित स्क्रीन्स के दम पर काफी कमाई कर ली। आगे भी करती रहेगी। फिर तमाम राइट्स बेचने से भी पैसे आएंगे। लेकिन आप कहां हैं? आप तो वो हैं जो अपने घर में बीबी के बोलने पर पाबंदी लगाते हैं। बच्चे सवाल न पूछें इसलिए डांट देते हैं। आप घर से जाते समय मां को बोलकर जाते हैं कि आधे घंटे में आ जाएंगे और दिन भर नहीं पहुंचते। ये भी चाहते हैं कि आपसे कोई सवाल भी न पूछे। तो जवाब सारी आजादी आपको ही क्यों चाहिए?

दीपिका का मुंह बंद कराकर आप खुद को तीस मार खां भले ही समझ रहे हों, लेकिन आप उस बर्बादी का हिस्सा बन रहे हैं। जो आने वाले समय में असहिष्णुता की सारी हदें पार कर देगा। समय है, अभी भी चेत जाईए।

 

दीपिका जेएनयू गईं। वहां हिंसा हुई थी। लेकिन उन्होंने किसी का विरोध या समर्थन नहीं किया। उन्होंने हिंसा के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत की। और बदले में आप उनका व्यवसाय, करियर बर्बाद करके उन्हें चुप कराना चाहते हैं? ये आपकी मर्दानगी है? माफ करिए, मैं आपके साथ नहीं हूं।

 

तान्हाजी बहुत बेहतरीन विषय पर बनी बहुत ही अच्छी फिल्म है। चूंकि अजय देवगन, अक्षय कुमार, अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार हवा के साथ बहते हैं, इसलिए आप उनका समर्थन करते हैं? आमिर खान जनता के साथ खड़े होने की कीमत डेढ़ दशक से चुका रहे हैं। प्रकाश राज पर तेलुगु फिल्म नगर में छ: बार बैन लग जाता है। गिरीश कर्नाड जैसे बड़े अभिनेता को आपका दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है। यही कमल हासन एक खास पार्टी के खिलाफ बोलते हैं तो उसे आम लोगों से जोड़कर उनके खिलाफ माहौल बनाया जाता है और दीपिका को रंडी बोला जाता है? क्यों भाई? क्या ये असहिष्णुता नहीं है? क्या जेएनयू की तरफ से बोलने वाली अपनी पत्नी से आप अलग हो जाते हैं? अपने बेटे को घर से निकाल देते हैं? सपा, बसपा, डीएमके, बीजेडी, टीआरएस को वोट देने वालों से आपका कोई रिश्ता नहीं रह जाता है? अगर उन सभी से आपका रिश्ता रहता है, तो दीपिका पादुकोण पर आपको गुस्सा क्यों आता है?

क्या आप चाहते हैं कि वो भी चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखने वालों में से रहे? पहले हिम्मत नहीं हुई तो नहीं बोली। अब छपाक के प्रोमोशन के समय दिल्ली में थी और जेएनयू पहुंच गई तो इतना हंगामा क्यों? मैं नहीं कहता कि ये फिल्म देखो या नहीं देखो। लेकिन इस तरह से खुद को असहिष्णु मत बनाइए। हिंदुस्तान को बचा लीजिए। यहां हर कोई अपनी बात रख सकता है। हर कोई विरोध प्रदर्शन कर सकता है। चूंकि आजाद मैदान की ही भीड़ आरे को बचाने पहुंचती है, तो उसकी पहचान नहीं बदलती। तो बाजीराव, पद्मावत के बाद लक्ष्मी उर्फ मालती बनी दीपिका आपके लिए रंडी क्यों हो गई? सोचिए, और बताइए कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या सौंप रहे हैं? नफरत? वैचारिक गुलामी? असहिष्णुता? और क्यों?

 

जवाब मांग रहा है देश (C) Epatrakaar.Com

मूल पोस्ट- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10219470848235794&id=1650949861

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