दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का दावा गलत, शीला सरकार में शिक्षा हुई थी बेहतर!

ePatrakaar
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अभिषेक रंजन झा। सरकार मैं कांग्रेस पार्टी से न जुड़ा हूँ, न समर्थक हूं। बावजूद मुझे बेहद अफसोस होता है कि दिल्ली की शिक्षा पर जब चर्चा होती है तो बड़ी आसानी से दिल्ली कांग्रेस की नेता शीला जी के कार्यकाल में शिक्षा पर हुए काम को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

 

कुछ बातें- अरविंद केजरीवाल व उसके समर्थक प्रचार तंत्र, झूठी बातों से यह करते नजर आते है कि दिल्ली के सरकारी स्कूल बीते 5 साल में ही बेहतर हुए है। 7-8 स्कूलों की तस्वीर दिखाकर यह बात बताई जाती है कि दिल्ली के स्कूल जर्जर, बदहाल हालत में थे। “आप” आए सरकार में और स्कूल रातोंरात विश्व स्तरीय बन गए।

AAP के धूर्त नेता यह भी कहते है कि दिल्ली के बच्चों का परीक्षा परिणाम उनके कार्यकाल में ही बेहतर हुआ है। सरकारी स्कूल के बच्चे प्राइवेट के बच्चों को पहली बार उनकी सरकार में ही पछाड़ रहे है। दिल्ली में शिक्षा बजट पर भी झूठ की खेती केजरी & कंपनी करती है। इसे बढ़ा चढ़ाकर बताती है।

 

आईये जानते है कि दिल्ली के पूर्व CM शीला दीक्षित जी ने दिल्ली की शिक्षा के लिए क्या किया-

 

1) अपने कार्यकाल में औसतन 2 स्कूल हर माह खोले। केजरीवाल 5 साल में 30 के आंकड़ों तक भी नही पहुंच पाए। इनमें से भी अधिकतर पिछ्ली सरकार द्वारा आवंटित स्कूल ही थे।

 

2) AAP सत्ता में आई तो केवल 54 स्कूलों को मॉडल स्कूल के रूप में चयनित किया जहां के बच्चे बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। बाकियों को उसने लॉलीपॉप थमाकर सिर्फ हवा में वाहवाही बटोरी। 54 मे से लगभग 60% स्कूलों में भी स्थिति अच्छी नही है, जितना पटपड़गंज के स्विमिंग पूल वाले 2 स्कूलों मे है।

 

शीला सरकार ने 2009 में रूपांतर प्रोजेक्ट के तहत 198 स्कूलों को हर तरह की सुविधा से लैस कर उन्हें बेहतर बनाने का अभियान शुरु किया था, जिसकी जिम्मेवारी DSIIDC को दी गई थी। जिन स्कूलों के साथ काम हुए वे दिल्ली के गरीब इलाकों में थे और पूरी दिल्ली के हर क्षेत्र के स्कूलों में से थे।

 

शीला जी ने केजरीवाल की तरह सिसोदीया के इलाके में कुछ अलग व्यवस्था, बाकी इलाकों में अलग व्यवस्था नही बनाई थी। आज हालत ये है कि पटपड़गंज के खिचड़ीपुर स्कूल में लगभग 17 बच्चों पर एक शिक्षक है, वही खजुरि खास, संगम विहार, कोंडलि, बुरारी आदि इलाकों में 60 से 80 बच्चों पर एक शिक्षक है।

 

3) शीला सरकार ने जितना बजट आवंटित किया, उसे खर्च किया। 2008-13 की ही बात करें तो बजट का 98% इस्तेमाल हुआ। वही केजरीवाल ने आँकड़ों में बजट खूब दिखाया लेकिन खर्च का प्रतिशत 80% का आंकड़ा भी नही छू पाया। शिक्षा में खर्च विधानसभा के बजट में कुछ और, खर्च के ऑडिट में कुछ और।

 

हालत ये है दिल्ली की आर्थिक क्षमता के अनुसार जितना खर्च शीला दीक्षित सरकार में होती थी, बजट तीगुना कागज पर दिखने के बावजूद वह औसत लगभग उतना ही है। राज्य के SGDP (State Gross Domestic Product) का दिल्ली आज भी 1.7% ही इस्तेमाल कर पाता है।

 

4) शीला दीक्षित सरकार ने कंप्यूटर शिक्षा पर जोड़ दिया था। साइंस पढ़ने के लिए जितने स्कूल उप्लब्ध थे, उनकी संख्या बढ़ाई। केजरीवाल सरकार के तमाम दावों के बावजूद आज भी 100% स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा उप्लब्ध नही है। 30% से भी कम स्कूलों में साइंस की पढ़ाई होती है।

 

5) 12th रिजल्ट पर केजरीवाल अपनी पीठ खुद ही थपथपाते है। आप के नेता यह दावा करते है- पहली बार हुआ है जब सरकारी ने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। लेकिन यह सच्चाई नही है। शीला सरकार में दिल्ली के बच्चों ने 2005 में -13 से पिछड़ने के बाद Pvt Schools को 2009 व 2010 में पछाड़ा है।

 

बीते 15 सालों में दिल्ली के सरकारी स्कूलों का पास प्रतिशत 85% से कम कभी नही हुआ। लेकिन जिस 10वीं के रिजल्ट में दिल्ली के सरकारी स्कूल 2001-02 में -45 से पिछड़ने के बाद 2013 में प्राइवेट स्कूल को पीछे छोड़ दिया था, AAP सरकार बनने के बाद परिणाम खराब होने का सिलसिला शुरु हो गया।

 

बीते 2 वर्षों से दिल्ली के स्कूलों में 10th का परिणाम राष्ट्रीय औसत से भी कम है। हालत इतनी खराब है कि आज दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परिणाम बीते 13 साल के सबसे निम्नतम स्तर पर है। 2006-07 में 77.12% पास प्रतिशत था, 2019 में 71.58% है। पिछ्ले साल 69% था। इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा?

 

अफसोस दिल्ली के बच्चों की शैक्षणिक स्थिति सुधारने का प्रयास करने की वजाए केजरीवाल सरकार साइंस, गणित की वजाए सोशल साइंस लेने के लिए बच्चों को बाध्य कर रही हैं। हालत ये बनी कि 2020 में 73% बच्चे #BasicMath लेकर 10th Exam में बैठेंगे, जो राष्ट्रीय औसत 30% से लगभग ढाई गुना अधिक है।

 

जहां शीला सरकार में 12वीं में बैठने वाले बच्चों की संख्या 44918 से बढ़कर 166257 हुई, केजरीवाल सरकार के दौरान हर साल घटते घटते 112826 हो गई। गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित करने के लिए केजरीवाल सरकार हर साल आधे बच्चों को फ़ेल, वही 2/3rd फ़ेल बच्चों को नामांकन ही नही दे रही है।

 

6) उच्च शिक्षा के लिए शीला दीक्षित ने कई प्रयास किए। नए कॉलेज, बच्चियों की शिक्षा के लिए Indira Gandhi Delhi Technical University for Women खोला। केजरीवाल 5 साल सोया रहा। सरकार से विदाई की बेला में विधानसभा का सत्र बुलाकर 3 यूनिवर्सिटी बनाने की घोषणा कर दी,जिसका कोई अता-पता नही।

 

उच्च शिक्षा का बंटाधार कर देने वाली आप सरकार 20 कॉलेज खोलने का वादा करके भी एक नया कॉलेज नही खोल पाई। लेकिन वह अपनी नाकामी छुपाने के लिए कभी DU में आरक्षण तो कभी पिछ्ली सरकार द्वारा खोले कॉलेजों को पैसा देने में हमेशा आनकानी करती रही, जो आज दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हैं।

 

7) शीला सरकार ने MCD स्कूलों के साथ दुश्मनों की तरह व्यवहार नही किया। लगातार सत्ता में रहने के बावजूद उस अघोषित नीति का पालन किया, जहां प्राइमरी एजुकेशन की जिम्मेवारी MCD के पास थी, हायर एजुकेशन की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार संभालती थी। यह हालत तब थी, जब MCD में BJP सत्ता में थी।

 

प्रचंड बहुमत के नशे में झूम रहे केजरीवाल की पार्टी को जब MCD चुनाव-2017 में जबरदस्त हार मिली तो साजिशन प्राइमरी की कक्षायें भी दिल्ली सरकार के अधीन के स्कूलों मे खोलना शुरु कर दिया। हालत ये है- कभी गिने-चुने स्कूलों में प्राइमरी सेक्शन थे, आज संख्या बढ़कर 700 से भी ऊपर हो गई है।

 

केजरीवाल सरकार की गलत नीतियों का खमियाजा MCD के स्कूल भुगत रहे हैं, जहां शिक्षकों को कभी समय पर वेतन नही मिला, वही प्राइमरी सेक्शन खुलने से बच्चे कम हो रहे है। वही विश्वस्तरीय स्कूल बनाने के दावों, प्राइमरी सेक्शन खोलने के बावजूद दिल्ली सरकार के स्कूलों में नामांकन कम हो रहे है।

 

8) शीला जी ने लाडली योजना के जरिये बच्चियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किए। वही केजरीवाल सरकार किशोरी योजना तक पर ध्यान नही दे पाया। 17 करोड़ बजट आवंटित किए, खर्च केवल 2 करोड़ किया। बीते 5 साल में एक भी विशेष कार्यक्रम बच्चियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए नही शुरु किया।

 

शीला जी ने शिक्षक से CM पोस्ट तक की यात्रा पूरी की थी।

 

केजरीवाल जी NGO, अन्ना आंदोलन का इस्तेमाल कर साल भर में बिना किसी संघर्ष के CM बन गए।

 

फर्क़ तो होगा ही न!

7-8 स्कूलों में काम करके उसे बेचने का तरीका आता तो आज शिक्षा के विषय पर हो रही चर्चा में शीला जी प्रमुखता से रहती।

 

अभिषेक रंजन झा मूलरूप से बिहार के हैं। बिहार के बाद अब दिल्ली को कर्मभूमि बनाए अभिषेक की कोशिश है कि राजनीति साफ सुथरी हो। उसमें बनावट न हो। तमाम सामाजिक आंदोलनों से जुड़े अभिषेक रंजन झा का नाम की कानूनी लड़ाईयों में भी आता है। बिहार के मुजफ्फरपुर में नवरुणा केस को लेकर उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद केस की जांच सीबीआई कर रही है। बिहार के कई नेताओं की गले की फांस के तौर पर भी अभिषेक की पहचान है। 

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