हालात खराब हैं, लेकिन देश को बहानों के दम चला रही केंद्र सरकार!

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जस्टिस फॉर डेमोक्रेसी। जब तक संभव होता है शहनाई की धुन सिसकियों की आवाज छुपा लेती है लेकिन, सिसकियां जब चीखों में तब्दील हो जाती हैं तो फिर उसे छुपा-दबा लेना संभव नहीं होता। देश की अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी का सच जब तक संभव था संस्थाओं ने छुपाने की पूरी कोशिश की लेकिन, जब अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की सिसकियां चीखने लगीं तो फिर सच्चाई को छुपाए रखना संभव नहीं हो सका और संस्थाओं को मानना पड़ा कि अब सबकुछ तबाह और बर्बाद हो चुका है। जिस बात को कई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी तीन साल पहले से कह रहीं हैं अब उस बात को धीमी आवाज में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के शीर्ष अधिकारी, सांख्यिकी विभाग के शीर्ष अधिकारी और नीति आयोग के शीर्ष अधिकारी भी कहने लगे हैं। अब सब ये मानने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है और देश रोजगार देने में अब उतना सक्षम नहीं रहा जितना साल 2011-12 तक था।

इकोरैप की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2018-19 में बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों ने अपने घरों में औसत के मुकाबले तीस फीसदी कम पैसे भेजे हैं। रिपोर्ट का विस्तृत अध्ययन करने पर पता चलता है कि बिहार और यूपी से दूसरे राज्यों में काम की तलाश में गए इन कामगारों को पहले मुकाबले कम दिन काम मिला। इतना ही नहीं पीछले पांच-छे वर्षों से इनकी मजदूरी में कोई इजाफा नहीं हुआ। किराए के मकानों में रहने वालों इन मजदूरों के मकान का किराया हर साल बढ़ा, खाने-पीने के खर्चे बढ़ती महंगाई की वजह से लगातार बढ़े लेकिन कमाई बढ़ने के बजाए घटती गई।

इस रिपोर्ट में एक और बेहद महत्व की बात सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में नए रोजगार की संभावना बहुत कम रहेगी। ईपीएफओ के आंकड़ों से अनुमान लगाया गया है कि इस वित्त वर्ष में पंद्रह हजार रुपये तक की तनख्वाह वाली नौकरियों में भारी गिरावट हो सकती है। अनुमान है कि इस वर्ष ऐसी 16 लाख नौकरियां कम हो जाएंगी। ये सिर्फ मासिक पंद्रह हजार वेतन वाली नौकरियां हैं। इससे ऊपर के वेतन वाली नौकरियों को जोड़ दिया जाए तो फिर ये आंकड़ा एक करोड़ के आस-पास पहुंच सकता है। क्योंकि ईपीएफओ के इस आंकड़े में केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों के साथ-साथ अपना रोजगार करने वालों के आंकड़े शामिल नहीं हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों के अवसर तो पहले से ही कम होते जा रहे हैं। एनएसओ का आंकलन बताता है देश की वित्तीय हालत ऐसी नहीं रही कि अब केंद्र सरकार भी पहले की तुलना में नियुक्तियां कर सके। राज्य सरकारों की हालत तो और खस्ता है। दिल्ली को छोड़ दें तो देश के किसी भी राज्य की माली हालत ठीक नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों की ये हालत बताती है कि चालू वित्त वर्ष में सरकारी नौकरियों के अवसरों में भारी कमी देखी जाएगी। ये कमी कम से कम 39 हजार पदों की होगी।

अब सवाल ये कि रोजगार का ये संकट इतना विकराल हुआ कैसे? जवाब बड़ा सीधा है कि वित्तीय कुब्रंधन की वजह से। मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के जो दूरगामी नतीजे बताए जा रहे थे वो दूरगामी नतीजे ढाई साल में ही सामने आ गए थे और पता चला कि देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बाद अब तो नीति आयोग ने भी मान लिया है कि विकास दर पांच फीसदी से भी नीचे रहेगी। मतलब देश के पास धन नहीं है और जब धन ही नहीं है तो फिर खर्च क्या करेंगे। मतलब न तो विकास का काम होगा और ना ही नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने अपने खर्चे बहुत बढ़ा लिए। सरकारी खर्चे में हुई बढोत्तरी ने देश के खजाने पर बड़ा असर डाला। देश के कई राज्यों ने भी ऐसा ही किया। आम आदमी की कमाई का बड़ा हिस्सा सरकार चलाने और सरकारी तामझाम में जाता रहा। यूपी सरकार ने तो अपना बहुत बड़ा बजट शहरों के नाम बदलने और ईमारतों के रंग बदलने में खर्च कर डाले। हुआ ये कि सरकारी योजनाओं को चलाने और निर्माण के लिए धन की कमी होती गई। धन की कमी को दूर करने का प्रबंध भी सरकार जब ठीक से नहीं कर पाई तो अप्रत्यक्ष करों में भारी बढ़ोत्तरी की गई। सेस के जरिए लोगों से अतिरिक्त पैसे लिए जाने लगे। सरकार की इस नीति ने महंगाई में आग लगा दी। हालत ये हुई कि आर्थिक विकास के मामले में देश पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश से भी पिछड़ गया।

पहले तो सरकार और सरकारी संस्थाओं ने पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, हिंदू-मुस्लिम और ना जाने किन-किन शोरों में इस सच्चाई को छुपाए रखा लेकिन जब विश्व बैंक समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान भारत की आर्थिक हालत पर चिंता जताने लगाने और खुद नीति आयोग, भारतीय रिज़र्व बैंक और सांख्यिकी विभाग की हालत चरमराने लगी तो उन्हें खुलकर ये स्वीकार करना पड़ा कि अब देश बर्बादी की कगार पर खड़ा है।

उम्मीद है कि सरकार अब भी चेतेगी और देश के जीवट नागरियों के हौसले से देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशों में जुटेगी। मोदी सरकार का अब तक का अनुभव ये बताता है कि सरकार अड़ियल रवैये से चल रही है और ग़लत फैसलों से हुए नुकसान को छुपाने के लिए देश का ध्यान इधर-उधर भटकाने में भी काफी नुकसान करती रही है। इसलिए ज़रूरी है कि सरकार अपनी गलतियों से सीख ले। भारत के नागरिकों का दिल बड़ा है और देश ने हर उस सरकार की गलतियों को माफ किया है जिस सरकार ने अपनी गलतियां मानी हैं और उन गलतियों को सुधारने की दिशा में काम किया है।

 

असित नाथ तिवारी वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई टेलीविजन न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं।

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