निर्जला एकादशी :-महत्त्व और व्रत कथा, भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से पूरी होगी सभी मनोकामना

Ashu Yadav

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है. निर्जला एकादशी का एक व्रत पांडवों के भाई भीम से जुड़ा है और जिस कारण इसे भीमसेनी एकादशी के नाम भी जानते हैं. निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है. मान्यता है इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है.

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निर्जला एकादशी व्रत

नई दिल्ली: आज निर्जला एकादशी का व्रत है और इस व्रत में अन्न तो दूर जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है और निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है. मान्यता है इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है.

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है. निर्जला एकादशी का एक व्रत पांडवों के भाई भीम से जुड़ा है और जिस कारण इसे भीमसेनी एकादशी के नाम भी जानते हैं.

एकदशी के दिन प्रातः सूर्योदय के साथ ही स्नान ध्यान के साथ भगवान विष्णु की पूजा अर्चना शुरू हो जाती है और श्रद्धालु पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण-ध्यान व जाप करते हैं. पूरे दिन और रात व्रत रखने के बाद सुबह सूर्योदय के बाद पूजा करके गरीबों और ब्रह्मणों को दान या भोजन कराया जाता है. इसके पश्चात ही भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है.

निर्जला एकादशी का महत्त्व

एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है और एक वर्ष में चौबीस एकादशियां आती हैं, परन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है.

निर्जला एकादशी व्रत कथा

एक बार भीम ने व्यासजी से कहा कि हे पितामह, भाई युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव सभी एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु मैं भगवान की भक्ति, पूजा तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं किंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता.

व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है और इस एकादशी में अन्न तो दूर जल भी ग्रहण नहीं किया जाता. तुम उस एकादशी का व्रत करो. इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए और न ही जल ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत टूट जाता है. इस एकादशी में सूर्योदय से शुरू होकर द्वादशी के सूर्योदय तक व्रत रखा जाता है. यानी व्रत के अगले दिन पूजा करने के बाद व्रत का पारण करना चाहिए.

व्यासजी ने भीम को बताया कि इस व्रत के बारे में स्वयं भगवान ने बताया था और यह व्रत सभी पुण्य कर्मों और दान से बढ़कर है. इस व्रत को करने से मनुष्य अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता हैं.

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