प्रशांत किशोर, पवन कुमार के जाने के बाद आरजेडी से डरे नीतीश कुमार?

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बिहार में इसी साल आखिर में विधानसभा का चुनाव होना है। राजनीतिक स्थितियों में यह साफ है कि नीतीश कुमार इस बार भी एनडीए गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे। लेकिन हर बार उनके बदलते स्टैंड की वजह से अब जनता उनसे दूरी बनाती दिख रही है।

नई दिल्ली। बिहार में राजनीतिक सरगर्मी जोरों पर है। हो भी क्यों न? चुनावी साल जो है। इस साल के आखिर में होने जा रहे चुनावों को देखते हुए सभी राजनीतिक पार्टियां अपने दांव-पेंच आजमाने लगी हैं, लेकिन इस बीच जो सबसे कमजोर खिलाड़ी बनकर सामने आ रहा है, वो है नीतीश कुमार का चेहरा। जी हां, इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं है। दरअसल, नीतीश कुमार पिछले कुछ समय से छटपटाहट में हैं। उनकी पार्टी में कोई रणनीतिक तौर पर चेहरा भी नहीं है और इसीलिए वो अब जाने-अनजाने विपक्षी पार्टियों के जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। नीतीश कुमार पहले एनआरसी पर फंसे, फिर एनपीआर पर और अब जातिगत जनगणना को लेकर भी उन्होंने अपनी राजनीतिक लाइन अलग कर ली है। जी हां, नीतीश कुमार ने जेडीयू की लाइन से हटते हुए इन तीनों ही मुद्दों पर राष्ट्रीय जनता दल के प्लान को कॉपी कर लिया है। आईए, समझाते हैं…

नीतीश कुमार बैकफुट पर हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण एनआरसी है। जेडीयू केंद्र सरकार में बीजेपी की सहयोगी और एनडीए का हिस्सा है। जिसमें उसने संसद में एनआरसी, सीएए, एनपीआर का समर्थन किया। सीएए पर विवाद के बाद नीतीश कुमार को अपने दो सबसे मजबूत सिपहसालारों पवन कुमार और प्रशांत किशोर से हाथ धोना पड़ा। दोनों ही नेताओं ने नीतीश कुमार को झटका देते हुए अलग राहें पकड़ ली। लेकिन अब नीतीश कुमार आरजेडी की लाइन पर आ गए हैं। आरजेडी की मांग पर नीतीश कुमार को बिहार विधानसभा में ये प्रस्ताव पास करना पड़ा कि बिहार में एनआरसी नहीं होगी। यही तो तेजस्वी यादव लगातार कहते भी आए हैं। तेजस्वी ने नीतीश पर पर्दे के पीछे से एनआरसी लागू कराने की कोशिश का आरोप लगाया था, जिसके बाद नीतीश कुमार को बैकफुट पर होते हुए एनआरसी के विरोध में बिहार विधानसभा में प्रस्ताव लाना पड़ा। इस प्रस्ताव का खिलाफत करने वाली बीजेपी मुंह ताकते रह गई और आरजेडी समेत विपक्षी दलों के दम पर ये प्रस्ताव पास करा दिया। मामला सिर्फ इतना भर ही नहीं है।

बिहार में बैन हुई एनआरसी, एनपीआर में भी होगा बदलाव

नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने संसद में एनडीए की लाइन पर चलते हुए एनपीआर को मंजूरी दी। लेकिन एनपीआर साल 2010 के प्रारूप पर लागू हो, ऐसी मांग तेजस्वी यादव लगातार कर रहे थे। आखिरकार नीतीश कुमार को झुकना पड़ा और उन्होंने तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय जनता दल की ये बात भी मान ली। अब बिहार में एनपीआर पर काम अप्रैल से शुरू होगा, लेकिन 2010 के प्रारूप पर। इस तरह से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू को दिल्ली और पटना में अलग अलग रास्तों पर चलना पड़ रहा है, जो उनकी मजबूरी को भी दिखा रहा है।

नीतीश कुमार किस कदर बेचैन हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार सिर्फ 72 घंटों के भीतर तीसरी बार घुटनों पर दिखाई पड़े। नीतीश कुमार ने आरजेडी की सबसे बड़ी मांग को मान लिया। इसमें जाति आधारित जनगणना की मांग सबसे प्रमुख है। इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा में जातिगत जनगणना कराने का अहम प्रस्ताव पास किया। आरजेडी के साथ-साथ बीजेपी ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया।

नीतीश कुमार ने बिहार का विकास तो किया, लेकिन…

चुनावी साल में सिर्फ 72 घंटो के भीतर हुए इन तीन बड़े फैसलों के कई मायने हैं। हालांकि नीतीश कुमार पिछड़ों और मुसलमानों के लिए खुद को मसीहा के तौर पर पेश करने में जुटे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि वो इन तीनों ही मुद्दों पर नीतीश कुमार की बेबरी दिख रही है। इसीलिए वो मजबूरी में वो हर काम कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय जनता दल उनसे बिहार के भले के लिए कराना चाहती है।

बिहार के सीएम बनना चाहते हैं प्रशांत किशोर, आम आदमी पार्टी को देंगे राष्ट्रीय स्वरूप!

गौरतलब है कि बिहार में इसी साल आखिर में विधानसभा का चुनाव होना है। राजनीतिक स्थितियों में यह साफ है कि नीतीश कुमार इस बार भी एनडीए गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगे। लेकिन हर बार उनके बदलते स्टैंड की वजह से अब जनता उनसे दूरी बनाती दिख रही है। ऐसे में आगामी चुनाव में नीतीश कुमार को कहीं सत्ता से बाहर न हो जाएं, ये देखने वाली बात होगी।

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