चुनावी प्रचार और गिरता सदाचार

Prakash Chandra

जब सियासी कुनबे वाले एक दूसरे पर जहरीले बयानों की गन्द उगलने लगे तो समझ लेना कि चुनावी दंगल की तैयारियां चल रही हैं। ये वही दंगल है जिसे हम बेचारे लोकतंत्र को खुश रखने के लिए लोकतंत्र का पावन पर्व भी कह देते हैं। ऐसा ही कुछ राजधानी दिल्ली में भी हुआ है। अपने विरोधी खेमे के सियासी कुनबे पर बयानों की आग उगल कर दंगल का ऐलान कर दिया गया है।देशद्रोही,आतंकवादी,बलात्कारी गद्दार जैसे कमतर कुशब्दों से अपने विरोधी को ललकार ही नहीं सकते,और धार्मिक उन्माद,धार्मिक घृणा,हिंसा नफरत से  कमतर कोई खेल खेल ही नहीं सकते।

आग उगलता नेता,उकसाई,आक्रोशित भीड़ चंद शब्दों में अगर चुनावी पर्व को बयान किया जाय तो ऐसा ही है।

क्या लोकतंत्र वाले देश में लोकतंत्र का पर्व या चुनाव ऐसे ही अंदाज में मनाया जाता था? बिल्कुल नहीं।

पर हाँ विरोधी खेमे उस वक्त भी होते थे,तख्तों पर टिका मंच और आवाज बुलंद करने वाला माईक तब भी था। मंच से अपनी बात रखने वाले नेता,और बात सुनने वाली जनता तब भी थी।

जमीन में पर टिके मंच पर खड़ा नेता जमीनी मुद्दों को लेकर जमीन में खड़ें लोगों से संवाद करता। अपने से दूसरे खेमे के नेता को विरोधी भले ही मानता हो,पर दुश्मन तो नहीं ही मानता था,मैं उदाहरण भी दे दूं –

ये करीब 56 वर्ष पहले लोकतंत्र के पावन पर्व का वाकिया है। जो विरोधी नेताओं के बीच संयम और सम्मान की भावना को पुख्ता करता है।

1962 के आम चुनाव के दौरान इलाहाबाद में एक चुनावी जनसभा में जनसंघ के प्रत्याशी राम गोपाल संड ने कांग्रेस के प्रत्याशी लालबहादुर शास्त्री को माईक देकर जनता से संवाद करने का आग्रह किया।दरअसल जिस मंच से जनसंघ के प्रत्याशी और अन्य नेता जनता को सम्बोधित कर रहे थे,तब शास्त्री जी भी अपने समर्थकों के साथ पास से गुजर रहे रहे थे। जनता ने अपने मांगों को लेकर अपना ज्ञापन उन्हें सौंपा,तो शास्त्री जी ने भी जनता की मांगों को लेकर अपनी बात मंच से जनता तक पहुंचानी चाही बिना देर किये उनके विरोधी नेता और जनसंघ के प्रत्याशी ने उन्हें अपनी बात कहने का आग्रह किया। ऐसा ही वाकिया इसी शहर में फिर हुआ जब शास्त्री जी ने अपने प्रतिद्वंद्धी चुनावी के गाड़ी खराब होने पर अपनी ही जीप से उन्हें चुनावी सभा तक छोड़ा। जब एक सर्मथक ने इस पर ऐतराज जताया तो उनका कहना था कि अगर हमारे विरोधी मतदाताओं तक अपनी बात नहीं पहुँचा सके तो मुकाबला बराबरी का नहीं रहता। इसलिये विरोधी को भी अपनी बात रखने का मौका देना चाहिए, और जनता खुद ही तय करेगी कि वोट किसे दें।

जहाँ आज धार्मिक और जातीय धुर्वीकरण से वोट बटोरने की कोशिश रहती है,ऐसी सोच को धुत्कारती लोकतंत्र के पर्व का एक वाकिया ये भी है-

1963 में फरुखाबाद का उपचुनाव, जहाँ से राम मनोहर लोहिया चुनाव लड़ रहे थे। एक चुनावी सभा के लिए उनके एक अभिन्न सहयोगी चौधरी सिब्ते मोहम्मद नकवी ने प्रचार के लिए आना था,जब  डाॅ. लोहिया और सिब्ते लखनऊ से  फर्रुखाबाद  चुनावी प्रचार के लिए जा रहे थे तो रास्ते में उनके एक साथी ने कहा-सिब्ते साब के प्रचार से हमें फर्रुखाबाद के मुस्लिम वोट जरूर मिलेंगे। इस पर लोहिया नाराज हो गए, और उन्होंने सिब्ते को प्रचार में आने के लिए इंकार कर दिया और कहा हम चुनाव अपने पार्टी के नीतियों सिद्धांतों पर जीतना चाहते हैं। इस बात पर लोहिया अडिग रहे और सिब्ते साब को वापस जाना पड़ा। डॉ लोहिया ने अपने वोटों के लिए मजहबी दांव नहीं खेला, फिर भी वो जीते।

सियासत में जीतते रहने की जिद में अब सियासी कुनबे के लोग कुछ भी करने पर आमदा हैं। शर्तिया जीत के लिए किसेको भी टिकट देकर चुनावी दंगल में खड़ा कर देते हैं। पर ये भी बता दूं एक वक्त कुछ ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते थे-

यह किस्सा चौधरी चरण सिंह के एक  प्रत्याशी से जुड़ा है। चौधरी चरण सिंह अपने एक प्रत्याशी  के पक्ष में भाषण देकर सभा के मंच से उतरे ही थे कि किसी ने उनको एक कागज थमाया,जिसमें उस प्रत्याशी के आपराधिक गतिविधियों का ब्यौरा था। बड़े ध्यान से पढ़ने के बाद  वो दोबारा मंच पर आये,और कहा जो पर्चा मेरे पास है ये शायद आप लोगों के पास भी होगा, इसमें जो लिखा है,अगर वो सच है तो मेरे इस प्रत्याशी को कतई वोट मत देना, भले ही हमारे विरोधी पार्टी को दे देना।

एक नेता का जनता के हितों,लोकतंत्र और अपने विरोधी के प्रति उदार,स्वभाव एक अच्छे लोकतंत्र की प्रथा को जन्म देती है। ये प्रथा को निभाने का सिलसिला हम सभी ने बाजपेयी के जमाने तक देखा होगा,बाजपेयी जी जनता के बीच प्रिय थे ही वो,अपने विरोधियों के भी प्रिय थे।ऐसे उदाहरण आम जनता को लोकतंत्र, लोकतंत्र के पर्व और अपने नेता के साथ आत्मीयता से जोड़ते हैं।

सियासत में परस्पर विरोध की जो ये नई परम्परा हम देख रहे हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई, इस बात के अभिलेख तो कहीं दर्ज नहीं हैं, पर सियासत में इस दर्जे का परस्पर बैर हैरान करने वाला है। धार्मिक मर्यादा, संवैधानिक मर्यादा को लांघ कर जिस तरह से हमारे नेता सियासी बैर को बढ़ाते जा रहे हैं, उससे लोकतंत्र की मर्यादा आये दिन तार-तार हो रही है। सियासी कुनबे के बीच घृणा, हिंसा षडयंत्र का असर अब आम लोगों के बीच भी रफ्तार से बढ़ रहा है। इसका परिणाम ये है कि अब अलग-अलग सियासी दलों के समर्थक एक दूसरे से द्वेष,घृणा हिंसा की परम्परा सियासी तर्ज पर निभा रहे हैं।

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