अस्तित्व का सवाल: क्या इंसान का अगला निशाना ईश्वर है?

Anchal Shukla

पत्थर की मूरत में आस्था जान डाल देती है, उसमें उन्हें पूजने वालों का विश्वास उसे और मज़बूत बनाता है. इस तरह आस्था और विश्वास को तोड़ा जाना बुरा है, अक्षम्य है.

इतिहास गवाह है जब भी व्यक्ति का नाश उस पर मंडराना शुरू करता है तो वो सबसे पहले उस व्यक्ति की बुद्धि हर लेता है. बुद्धिहीन व्यक्ति अपने नाश की ओर पूरी ताक़त से बढ़ने लग जाता है. धरती पर छाए कोरोना नाम के काले बादल अभी ज़रा भी छटे नहीं हैं, ज़िंदगी और मौत के बीच झूलते इंसानी जीवन को जिस वक्त अपने अपने ईश्वर से दुआएं करनी चाहिए थीं, वो ईश्वर के मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं.

मुश्किल वक़्त में जब दुनिया तमाम की दुआएं पढ़ी जाने वाली जगहें अपने ईश्वर प्रेमी भक्त के इंतज़ार में हैं वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मूर्खता की सीमा पार कर रहे हैं.

ईश्वर को मानना या ना मानना अलग बात है, लेकिन उनका अनादर नहीं किया जाना चाहिए. जैसे हमारे घर में हमारे बुज़ुर्ग हैं ठीक वैसे ही इस संसार में हम सबके लिए हमारे बुज़ुर्ग हमारे ईश्वर हैं. जो हमारे लिए सही और ग़लत तय करते हैं. ऐसे में आज एक ख़बर देखी कि कुछ शरारती तत्वों ने हरदोई शहर में शाहजहांपुर रोड पर सड़क किनारे स्थित भगवान हनुमान जी की मूर्ति को तोड़ दिया. ये बेहद तकलीफ़ देने वाली ख़बर है. वहीं इससे पहले एक और वीडियो नज़र में आई जिसमें बिलग्राम चुंगी स्थित एक वृक्ष के पास रखी ईश्वर की मूर्तियों को एक युवक तोड़ता नज़र आ रहा है.

ईश्वर की मूर्ति तोड़े जाने का दुःख तो पहाड़ है, लेकिन जिस बेरहमी से उसने मूर्तियां तोड़ी वो सीधे दिल-दिमाग पर चोट दे रही है. ऐसा ही एक मामला हरदोई के एक शिव मंदिर में घटा था जहां शिवलिंग को तोड़ा गया था. ऐसे अमानवीय घटनाओं को देख सोचता हूँ कि क्या अब धरती पर चलने फिरने वाले मांस के लोथड़ों का निशाना ईश्वर है? क्या वाकई ये उस दौर को दोहरा रहे हैं जिसमें राक्षस और दानवों का वास था?

दानवों का दौर फिर भी ख़ुशनसीब रहा कि उन्हें तारने के लिए ईश्वर आए, उन्हें ईश्वर के हाथों दानव होने से मुक्ति मिली.

कोरोना आया तो लगा जैसे इंसान अपनी ग़लतियाँ समझेगा और भ्रम की दुनिया से बाहर निकल ना सिर्फ़ ईश्वर और प्रकृति से माफ़ी मांगेगा बल्कि बीती बातों को दोहराने से तौबा कर लेगा. जीवन कब मृत्यु की शैय्या पर लेट जाए नहीं पता, ऐसे में इंसान का ऐसा विभत्स रूप देखना एक डर पैदा करता है, ऐसा डर जो शायद कभी शैतान को सोच कर नहीं लगा होगा.

पत्थर की मूरत में आस्था जान डाल देती है, उसमें उन्हें पूजने वालों का विश्वास उसे और मज़बूत बनाता है. इस तरह आस्था और विश्वास को तोड़ा जाना बुरा है, अक्षम्य है.

याद रखियेगा जो गर ईश्वर ने अपनी हथेलियों से छोड़ा तो युगों युगों तक कोई भी तार ना सकेगा.

-अस्तित्व

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