दंगे ‘इन्सान’ नहीं ‘परिवार’ निगलते हैं: जो चलना सिखाते हैं, उनकी अर्थी उठवाते हैं!

ePatrakaar

यह तस्वीर महज तस्वीर नहीं है बल्कि उस भारत की आत्मा के जलने का प्रतीक है जिसे दंगाइयों ने ‘मजहब का चस्मा’ पहन कर जला दिया.

‘पीड़ा’ और ‘दर्द’ महज शब्द नहीं हैं यह वो भावना है जो इस मासूम बच्चे की आँखों में देखी जा सकती है. यह तस्वीर महज तस्वीर नहीं है बल्कि उस भारत की आत्मा के जलने का प्रतीक है जिसे दंगाइयों ने ‘मजहब का चस्मा’ पहन कर जला दिया. मासूमियत की इस मूरत के बहते हुए आँसू पूछ रहे हैं बता मेरा ‘मजहब’ क्या है. इस असहनीय पीड़ा का भार क्या इस मासूम के नाजुक कंधे सह सकते हैं. जिन नाजुक कंधों पर स्कूल का बस्ता होना चाहिए, उन पर आज उस पिता की अर्थी का बोझ लद गया है जिसने उसे गिर कर संभलना सिखाया था।

 

 

कोई दंगाइयों से पूछे कि इस मासूम का कसूर क्या है, इतनी कम उम्र में पिता का साया उठ गया। अभी तो इस मासूम ने दुनिया की दुनियादारी भी ठीक से नहीं समझी होगी, वो क्या समझेगा ‘दंगा’ क्या होता है। वो दंगा जो चंद राक्षसों की मानसिक विकलांगता का परिणाम है।

 

यह दंगाई शायद भूल जाते हैं कि जो नफरत का ‘बीज’ वो बौ रहे हैं वो एक दिन ‘पेड़’ बन कर उनको और उनके परिजनों को निगल जाएगा। विश्वास मानिए एक दिन ऐसा जरूर आएगा। जिस नफरत की आग से दंगाई दूसरे का घर जलाते हैं एक दिन वे खुद उसमें झुलस जाएंगे। मेरा पूर्ण विश्वास है कि ऐसे मानवता के ‘हत्यारों’ को ‘नरक’ और ‘जहन्नुम’ में भी जगह नहीं मिलेगी। अपनी लगाई हुई आग में वे मरणोंपरांत भी जलते रहेंगे।

 

सच कहूँ इस तस्वीर को देखने के बाद मेरे मन में भावनाओं का उबाल उठने लगा। इस बच्चे की पीड़ा को महसूस करने लगा। मन में प्रश्न उठने लगा कि नफरत के जिस माहौल में हम लोग आज जी रहे हैं कहीं यह ‘मंजर’ एक ‘अभिशाप’ न बन जाए। दंगे ‘जानें’ नहीं ‘परिवार’ निगलते हैं। ‘मौत’ मजहब देख कर आती तो न शायद हिन्दू मरता न मुसलमान। लेकिन इसने तो सबको निगला है चाहे वो ‘जय श्रीराम’ कहने वाला ‘तिलकधारी’ हिन्दू हो या फिर , अल्लाह हु अकबर कहने वाला ‘टोपीवाला’ मुसलमान हो।

 

‘हिंसक’ और ‘मानसिक विकृति’ के लोग सभ्य समाज के लिए ‘तेजाब’ हैं। ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी है। उनको समाज से ‘अलग’ करना जरुरी है। ऐसा समय रहते कर लीजिए नहीं तो एक दिन उन्हीं में से एक ‘भक्षक’ बनके आपकी ‘जगमगाती’ जिंदगी को ‘अंधकारमय’ बना देगा।

 

‘दंगाई’ कोई आदमी नहीं एक सोच है एक ऐसी सोच जो न केवल समाज के विभाजन का काम करती है बल्कि परिवारों की खुशियां भी लील लेती है। इस सोच को ‘फन’ फैलाने से पहले ‘कुचलना’ होगा। एक सभ्य नागरिक होने के नाते यह आपकी भी जिम्मेदारी है कि इन ‘नागों’ के ‘डसने’ से पहले ही इनकों कुचल दिया जाए। यह नाग ‘चूहे’ बन कर आपके आस-पास ही छुपे बैठे हैं। यह हरदम मौके की तलाश में रहते हैं कब यह अपने असल रंग में आए।

 

यह कटु सत्य है कि इन नागों (दंगाइयों) को हमारे ही देश के नेता ‘विषैला दूध’ पिलाते हैं। उनमें ज़हर भरने का काम करते हैं। ऐसे नेताओं को भी पहचानिए। ‘लोकतंत्र’ आज के दौर में ‘लोभतंत्र’ में तब्दील हो गया है जहां ‘लोक’ पर ‘नेताओं’ का ‘लोभ’ भारी है।

 

अंत में दिल्ली के दंगों में आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा के साथ हुई हैवानियत पर क्या कहूँ। 400 से ज्यादा बाए शरीर पर वार किए गए हैं। इन ‘दंगाइयों’ ने ‘अंकित’ को नहीं मारा, अपनी उस विकृत सोच का प्रदर्शन किया है जो उनके दिमाग में ‘कोढ़’ की तरह फैल गया है।

 

रोहित श्रीवास्तव (यह मेरी एक भावुक अभिव्यक्ति है जिसका एक ही उद्देश्य है नफरत को आईना दिखाना)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

Women’s Day Special : Here are 9 Bollywood Movies That Celebrate Womanhood

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:| This is a verse from ancient scripture, Manusmriti which […]

You May Like