महिला आजादी: पुरुष ही क्यों तय करते हैं सबकुछ ?

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श्याम मीरा सिंह।  “सऊदी अरेबिया लिमिटेड कंपनी” और फ्रेंड्स ऑफ अपीजमेंट” द्वारा बुर्का को “मैटर ऑफ चॉइस” कहा जाता है, इसके लिए इन्होंने शातिराना ढंग से एक तर्क भी गढ़ा है कि औरतों को भी “फ्रीडम ऑफ क्लॉथ” है, औरतों को क्या पहनना है, ये औरतें तय करेंगी.

इसलिए सबसे पहले जानना जरूरी है कि चॉइस कैसे बनती हैं. सेंट्रल इनफार्मेशन मिनिस्ट्री से “योजना” नाम की एक पत्रिका निकलती है. उसमें एक लेख था, घरेलू हिंसाओं पर, उसमें एक सर्वे का जिक्र किया गया जिसके अनुसार 57 प्रतिशत भारतीय औरतों ने माना कि उनके पति द्वारा उनके साथ की जाने वाली घरेलू हिंसा एकदम जायज है. उनका पति यदि उन्हें पीटता तो किसी गलती पर ही पीटता होगा, उनका पति उनके हित के लिए ही उन्हें पीटता है.

अब फेक लिबरल्स की मानूं तो औरतों का अपने पति द्वारा पिटना भी चॉइस है! भारतीय औरतें खुद तय करेंगी कि उन्हें किससे पिटना है किससे नहीं!

क्या उन औरतों को उनकी समझ पर छोड़ा जा सकता है? क्या उन्हें पिटने के लिए छोड़ा जा सकता है? क्योंकि ऐसा उन्हें जायज लगता है? क्या ऐसे में अन्य लोगों, अन्य धर्म के लोगों को इसपर बोलने का, सोचने का, डिबेट का कोई हक नहीं है? क्या अन्य मर्दों को इसपर बोलने का, लिखने का कोई अधिकार नहीं है? क्योंकि पिटना तो औरतों की चॉइस है न, let them decide naaaa…

इसलिए जब भी कोई घूंघट और बुर्का को चॉइस की बात कहकर खारिज कर देता है तब या तो इससे इरिटेशन होती है या उसके विचारों से अपीजमेंट की बू आती है.

अब जानते हैं बुर्का (याद रहे हिजाब नहीं) या घूंघट कितना मैटर ऑफ चॉइस है

पहला पॉइंट
यदि बुर्का मैटर ऑफ चॉइस है तो “सऊदी अरब” की औरतें कुछ दिन पहले बुर्के के खिलाफ एक आंदोलन न चला रही होतीं.

तालिबान ने अफगानिस्तान में सरकार आते ही बुर्के को वहां की औरतों के लिए बुर्के पहनने को अनिवार्य न करता. साफ है वहां की सभी औरतों की चॉइस बुर्का पहनने की नहीं रही होगी. लेकिन इस्लामिक राज्य के नेचर की वजह से उन्हें एक खास कपड़ा से अपने बदन को ढकने के लिए बाध्य किया गया.

70 के दशक में ईरान में इस्लामिक क्रांति के पहले लड़कियां बिना बुर्के के यूनिवर्सिटियां जाती थीं, दोस्तों के साथ घूमती थीं, वहां की अधिकतर औरतें मॉडर्न कपड़े पहनना पसंद करती थीं लेकिन इस्लामिक राष्ट्र बनते ही, बुर्का ईरान की औरतों पर लाद दिया गया. चूंकि उनके अनुसार ये एक धार्मिक आदेश था. उनके किसी रसूल ने कहा होगा कि पर्दे में रहो. आज ईरान की औरतें नहीं चाहतीं कि वह भी खुले बालों में विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाएं? यदि सामूहिक बुर्का चॉइस होता तो ईरान की औरतों को इस्लामिक क्रांति के बाद बुरका के लिए बाध्य न किया जाता.

दूसरा पॉइंट-
क्या पूरी दुनिया में महिलाओं को इतनी फ्रीडम है कि वह जो चाहे पहन सकें? बुरका और घूंघट के खिलाफ लड़ाई ही इस बात की है कि औरतों को “फ्रीडम ऑफ क्लॉथ” है। मर्द, समाज, रिवाज, परम्परा या कोई धर्म तय नहीं कर देगा कि उन्हें क्या पहना है. हम तो इसी बात के लिए लड़ रहे हैं कि महिलाओं को आजादी मिलनी चाहिए कि उसे क्या पहनना है, क्या नहीं. उनपर बुर्का, घूंघट, या साड़ी पहनना अनिवार्य करने का अधिकार बिल्कुल भी मर्दों को या किसी मजहबी किताब को नहीं है, न कुरान को है, न शरीयत को है, न मनुस्मृति या रामायण को है.

तीसरा पॉइंट
इसके लिए पढ़े लिखे लिबरल संविधान को quote करते हैं कि संविधान ने उन्हें धार्मिक अधिकार दिया है.

उसी संविधान में बाकी क्या कुछ लिखा हुआ है ये लोग कभी नहीं बताएंगे, उसी संविधान में आर्टिकल 51(a) में संविधान अपेक्षा करता है अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है -to renounce practices derogatory to the dignity of women

उसी संविधान में संविधान अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है -Develop scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform

उसी संविधान में लिखा हुआ है कि नागरिक अपनी संस्कृति का वैज्ञानिक आधार पर मूल्यांकन करेंगे. लेकिन लिबरल लोग इस बात को चबा जाते हैं।

श्याम मीरा सिंह। लेखक युवा पत्रकार हैं।

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