स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया में बढ़ाया भारत का मान 

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वीर विनोद छाबड़ा। आज महान आध्यात्मगुरु नरेन्द्रनाथ दत्त उर्फ़ स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन है। पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखने वाले उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे। नरेंद्र का बचपन आम बच्चो के समान था, नटखट और खिलंदड़ा स्वभाव। उनकी माता भक्ति भाव में अटूट विश्वास रखती थीं। नरेंद्र पर उनका प्रभाव पड़ा। परमात्मा को पाने की लालसा जागी। अध्यात्म के प्रति लगाव बढ़ा। नरेंद्र ने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस की रुग्ण अवस्था में बहुत सेवा की। उन दिनों वो अपने परिवार की परवाह न करके गुरूसेवा में लगे रहे। उन्होंने ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें धर्म और जाति के आधार पर मानव में कोई भेद-भाव न हो। मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में उन्होंने गेरूआ वस्त्र धारण कर लिये। वो नरेंद्र से विवेकानंद हो गए। मानव और मानवता को समझने के लिए पूरे भारत की पैदल यात्रा की।

1893 में विश्व धर्म परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व करने वो शिकागो पहुंचे। तब भारत एक गुलाम देश था। यूरोप और अमेरिका के अनेक गोरी चमड़ी वाले भारतियों से घृणा करते थे। कई लोगों ने कोशिश की कि विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद में बोलने का अवसर न मिले। लेकिन एक अमेरिकी मित्र ने यह कुटिल चक्र विफल कर दी। मगर उन्हें बोलने के लिए थोड़ा ही समय मिला। जब उन्होंने कहा – अमेरिकी बहनों और भाइयों। आपके उत्साहपूर्ण हार्दिक अभिनंदन से मेरा हृदय अवर्णनीय असीम आनंद से भर आया है। मैं आपको संसार की सबसे प्राचीन ऋषि मुनि परंपरा की और से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की और से धन्यवाद देता हूं। और मैं आपको सभी वर्गों और संप्रदायों के कोटि कोटि हिन्दुओं की और से भी धन्यवाद देता हूं.…उनके विचार सुन कर लोग हैरत में पड़ गए। भारत, भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति के बारे में लोगों ने प्रथम बार जाना। पिन ड्राप साइलेंस में उनका भाषण हुआ। और समाप्ति पर सारे दर्शकों ने खड़े होकर देर तक तालियां बजाईं।

स्वामी विवेकानंद के अमेरिका प्रवास के दौरान कुछ रोचक घटनायें भी हुईं। स्वामीजी एक अमेरिकी महिला के घर पर रुके थे। अपना भोजन वो स्वयं बनाते थे। एक शाम वो थके-हारे लौटे। बहुत भूख लगी थी। जब वो भोजन बना रहे थे तो देखा कि उनके आस-पास कुछ बच्चे जमा हो गए। वे भूखे थे। स्वामीजी ने अपने लिए बनाया भोजन उन्हें दे दिया। मेजबाज महिला को हैरानी हुई – सब तो बच्चों को दे दिया। अब आप क्या खाएंगे? स्वामीजी ने मुस्कुरा कर कहा – रोटी तो किसी न किसी के पेट की आग को ठंडा करती है। मेरी न सही किसी और की सही। देने से बड़ा दूसरा कोई आनंद नहीं है। वो महिला नतमस्तक हो गई।

ऐसा ही एक और रोचक प्रसंग बताया जाता है। भ्रमण के दौरान स्वामीजी ने देखा कि कुछ लड़के नदी में तैर रहे अंडों के छिलकों पर बंदूक से निशाना लगा रहे हैं। निशाना बार बार चूक रहा है। स्वामीजी से रहा नहीं गया। उन्होंने एक लड़के से बंदूक लेकर निशाना लगाया। बिलकुल सटीक निशाना लगा। लड़कों ने ताली बजाई। स्वामीजी रुके नहीं। एक के बाद एक दर्जन भर निशाने लगा दिए। लड़के हैरान – यह कैसे किया? स्वामी जी ने कहा – बिलकुल सिंपल। जो भी करो, स्वयं को उस पर पूरी तरह फ़ोकस कर लो। कभी चूकोगे नहीं। मेरे भारत में बच्चों को यही सिखाया जाता है। उन अमेरिकी लड़कों ने स्वामीजी को सैल्यूट किया।

अफ़सोस कि स्वामी जी का 04 जुलाई 1902 को 39 वर्ष की अल्पायु में ही निधन हो गया।

 

वीर विनोद छाबड़ा: लेखक लंबे समय से सम सामयिक मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। करीब 4 दशकों के लेखन में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। सिनेमा, खेल, अध्यात्म की दुनिया पर खास पकड़ है।

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